मेरी यात्रा - भारत की ज्ञान की यात्रा
1. विष्णुप्रयाग:
यह पंचप्रयागों में पहला है, जहाँ अलकनंदा नदी का मिलन धौलीगंगा से होता है। यह चमोली जिले में स्थित है। पौराणिक कथाओं
के
अनुसार, यहाँ नारद मुनि ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए थे। यहाँ
का
वातावरण अत्यंत शांत और अलौकिक है।
2. नंदप्रयाग:
नंदप्रयाग में अलकनंदा और नंदाकिनी नदियों का संगम होता है। माना जाता है कि इस स्थान का नाम राजा नंद के नाम पर पड़ा
है,
जिन्होंने यहाँ एक महान यज्ञ किया था। यह स्थान न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी प्राकृतिक सुंदरता और
शांत
परिवेश के लिए भी पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है।
3. कर्णप्रयाग:
यह वह स्थान है जहाँ अलकनंदा और पिंडर नदी (जिसे कर्ण गंगा भी कहते हैं) आपस में मिलती हैं। मान्यता है कि महाभारत के
महान
योद्धा कर्ण ने इसी स्थान पर सूर्य देव की उपासना की थी और अभेद्य कवच-कुंडल प्राप्त किए थे। यहाँ स्वामी विवेकानंद ने
भी
कुछ समय ध्यान में व्यतीत किया था।
4. रुद्रप्रयाग:
रुद्रप्रयाग में अलकनंदा का संगम मंदाकिनी नदी से होता है। यह स्थान भगवान शिव के 'रुद्र' अवतार को समर्पित है। पौराणिक
कथाओं के अनुसार, यहाँ नारद मुनि को संगीत की शिक्षा देने के लिए भगवान शिव ने रुद्र रूप धारण किया था। यह केदारनाथ और
बद्रीनाथ धाम जाने वाले यात्रियों के लिए एक प्रमुख केंद्र है।
5. देवप्रयाग:
यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण प्रयाग है, जहाँ अलकनंदा और भागीरथी नदियों का मिलन होता है। इसी संगम के बाद नदी को
आधिकारिक
रूप से 'गंगा' के नाम से पुकारा जाता है। देवप्रयाग को "देवताओं का संगम" माना जाता है और यहाँ स्थित रघुनाथ जी का
प्राचीन
मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है।