मेरी यात्रा

भारत की ज्ञान की यात्रा

मेरी यात्रा - भारत की ज्ञान की यात्रा

छः शाश्त्र Photo Left
1. सांख्य शास्त्र (ऋषि कपिल): ​सांख्य दर्शन संसार को प्रकृति और पुरुष (चेतना) के मेल से बना मानता है। यह सबसे प्राचीन दर्शनों में से एक है, जो सृजन की प्रक्रिया को वैज्ञानिक ढंग से समझाता है। इसके अनुसार, जब पुरुष और प्रकृति का संयोग होता है, तब बुद्धि और अहंकार जैसे तत्वों का जन्म होता है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य को दुखों से मुक्ति दिलाना और तत्वज्ञान के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना है।
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​2. योग शास्त्र (ऋषि पतंजलि): ​योग शास्त्र मुख्य रूप से चित्त (मन) की वृत्तियों के निरोध पर केंद्रित है। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन का विज्ञान है। पतंजलि के 'अष्टांग योग' (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) के माध्यम से साधक अपने मन पर विजय प्राप्त कर ईश्वर या आत्म-स्वरूप में लीन हो सकता है।
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​3. न्याय शास्त्र (ऋषि गौतम): ​न्याय दर्शन को तर्कशास्त्र या प्रमाणशास्त्र भी कहा जाता है। यह ज्ञान प्राप्त करने के सही साधनों (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द) पर जोर देता है। गौतम ऋषि के अनुसार, मोक्ष की प्राप्ति के लिए तत्वों का सही ज्ञान आवश्यक है, और वह ज्ञान केवल तर्कसंगत बुद्धि और प्रमाणों के आधार पर ही सिद्ध किया जा सकता है। यह वैज्ञानिक जांच की पद्धति जैसा है।
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​4. वैशेषिक शास्त्र (ऋषि कणाद): ​वैशेषिक दर्शन परमाणुवाद का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। ऋषि कणाद ने बताया कि यह दृश्य जगत अत्यंत सूक्ष्म कणों यानी 'परमाणुओं' से बना है। यह शास्त्र सृष्टि के द्रव्यों (पदार्थों) का वर्गीकरण करता है और भौतिक जगत की संरचना को समझने का प्रयास करता है। इसमें 'विशेष' नामक तत्व पर बल दिया गया है, जो एक वस्तु को दूसरी से अलग बनाता है।
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​5. पूर्व मीमांसा (ऋषि जैमिनी): ​पूर्व मीमांसा का मुख्य आधार वेदों के कर्मकांड और धर्म का पालन करना है। जैमिनी ऋषि के अनुसार, वेदों में बताए गए यज्ञ और अनुष्ठान ही मनुष्य के कल्याण का मार्ग हैं। यह शास्त्र कर्म के सिद्धांत और मंत्रों की शक्ति पर गहरा विश्वास रखता है। इसका उद्देश्य धर्म की व्याख्या करना और यह बताना है कि सही कर्मों के माध्यम से कैसे स्वर्ग या शुभ फल प्राप्त किए जा सकते हैं।
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​6. उत्तर मीमांसा या वेदांत (ऋषि बादरायण): ​वेदांत दर्शन को उपनिषदों का सार माना जाता है। यह ब्रह्म और आत्मा की एकता पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि यह संसार माया है और केवल 'ब्रह्म' ही परम सत्य है। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे महान संतों ने इसी दर्शन की अलग-अलग व्याख्याएँ (अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि) दी हैं। यह आत्म-ज्ञान के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।